बिहार में सुलग गई बीड़ी की सियासत, कांग्रेस ने एनडीए को दिया एक और बड़ा चुनावी मुद्दा Bidi politics ignited in Bihar, Congress gave another big election issue to NDA
बिहार में सुलग गई बीड़ी की सियासत, कांग्रेस ने एनडीए को दिया एक और बड़ा चुनावी मुद्दा
Bidi politics ignited in Bihar, Congress gave another big election issue to NDA

रवि पाराशर
देश में सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे केरल में कांग्रेस ने अनपढ़ों वाली बात कर दी है। तंबाकू उत्पादों पर जीएसटी दरों के हवाले से बिहार में एनडीए पर चुनावी फायदा उठाने की कोशिश करने का आरोप केरल प्रदेश कांग्रेस ने आधिकारिक तौर पर लगाया, तो एनडीए को एक और कड़क मुद्दा मिल गया। पीएम की मां को गाली के मसले पर तो महागठबंधन बैकफुट पर आ ही गया है, अब एनडीए ने ‘ब से बिहार और ब से बीड़ी’ वाले केरल कांग्रेस के बयान पर भी महागठबंधन को घेर लिया है।
असल में जीएसटी काउंसिल ने बीड़ी पर टैक्स 28 फीसदी से घटा कर 18 प्रतिशत कर दिया है। साथ ही सिगरेट और दूसरे तंबाकू उत्पादों पर टैक्स दर 28 फीसदी से बढ़ा कर 40 प्रतिशत कर दी है। केरल कांग्रेस ने इसे सियासी नजर से देखते हुए यह संदेश देने की कोशिश की कि बिहार में चुनाव है और एनडीए चाहता है कि बीड़ी सस्ती कर फायदा उठा ले। कांग्रेस के संदेश का एक स्पष्ट मतलब यह भी निकला कि बिहार बीड़ी पीने वालों यानी गरीबों का राज्य है।
जैसे ही कांग्रेस का संदेश सामने आया, बीजेपी और सहयोगी पार्टियों ने उस पर धावा बोल दिया। उन्होंने इसे बिहार की अस्मिता से जोड़ने में देर नहीं लगाई। कांग्रेस को भी समझ में आ गया कि नुकसान हो चुका है। पार्टी ने अपने आधिकारिक हैंडल से बीड़ी और बिहार वाली पोस्ट हटाने में ही भलाई समझी। लेकिन तीर तो अब कमान से निकल गया है। वापस कैसे लौट सकता है?
सवाल यह है कि क्या बीड़ी को किसी की हैसियत से जोड़ा जा सकता है? केरल कांग्रेस की मानसिकता क्या यह है कि बीड़ी पीने से किसी की सामाजिक स्थिति निम्न स्तर की ही होगी? यह नजरिया बिल्कुल गलत है। जहां तक गरीबों के बीड़ी पीने का मामला है, तो मैंने खुद से दो-तीन फुट की दूरी पर देश के एक प्रमुख मीडिया संस्थान के खरबपति मालिक को बीड़ी पीते देखा है। हालांकि उन्होंने अब धूम्रपान छोड़ दिया है। कई बड़े साहित्यकार और दूसरे पेशों से जुड़े संपन्न व्यक्ति भी बीड़ी पीते देखे जा सकते हैं। तो ऐसी धारणा बना लेना कि जो बीड़ी पीता है, वह गरीब, अनपढ़ ही होगा, पूरी तरह गलत है।
ऐसी मानसिकता के शिकार राजनेताओं ने बहुत बार गरीब आदमी के इस्तेमाल की चीजों को विरोध का जरिया बना कर उनका अपमान किया है। साल 1990-91 के आसपास का वाकया है। तारीख याद नहीं है, लेकिन मैंने तत्कालीन विधायक रमा पायलट को साइकिल से राजस्थान विधानसभा के बजट सत्र में शामिल होने के लिए आते खुद देखा था।
उन्होंने तब पेट्रोल बंदी के विरोध में ऐसा किया था। अब जरा सोचिए कि पेट्रोल की किल्लत का विरोध साइकिल के जरिये कैसे हो सकता है? वे स्कूटर, मोटर साइकिल या कार को धक्का मारते हुए आतीं, तब तो ऐसा करना सार्थक होता। साइकिल तो पेट्रोल-डीजल से चलती नहीं है। वह तो गरीब आदमी की अंतिम सवारी होती है। इस मामले में विरोध का जरिया साइकिल कैसे हो सकती है? लेकिन रमा पायलट अपनी योजना में कामयाब रहीं और अगले दिन के सभी अखबारों में उनकी तीन-चार कॉलम की तस्वीरें हाइलाइट हो गईं। वे प्रचार चाहती थीं, वह उन्हें मिल गया।
अब आते हैं इस बात पर कि बीड़ी पर जीएसटी दरें कम किए जाने से आखिर होगा क्या? सही है कि आम तौर पर बीड़ी विपन्न वर्ग के लिए धूम्रपान का प्रमुख जरिया है। लेकिन भारत में बीड़ी का कारोबार अरबों रुपयों में होता है। एक अनुमान है कि देश में करीब सात करोड़, 20 लाख लोग बीड़ी पीते हैं और इसके कारोबार से 70 लाख लोगों को सीधे और परोक्ष तौर पर रोजगार मिलता है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत में करीब 49.82 लाख रजिस्टर्ड बीड़ी मज़दूर हैं। इनमें से ज्यादातर छोटे कस्बों और गांवों में रहते हैं। बीड़ी मजदूरों में 90 फीसदी महिलाएं शामिल हैं। ऐसे में अगर सस्ता होने पर अगर बीड़ी उत्पादन में बढ़ोतरी हुई, तो इसका सीधा फायदा ग्रामीण अर्थव्यवस्था, खास कर गांवों की महिलाओं को मिलेगा। कमाई बढ़ने से उनकी सामाजिक हैसियत में इजाफा होना तय है।
अब यह भी जान लीजिए कि सिर्फ बिहार ही नहीं, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश बड़े पैमाने पर बीड़ी उद्योग के गढ़ हैं। पुर्तगाली लोग 1600 के दशक में बीड़ी ले कर भारत आए थे। तब से अब तक भारत तंबाकू और बीड़ी उत्पादों के मामले में दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक और तीसरा सबसे बड़ा निर्यातक देश है। साल 2014 तक भरतीय बीड़ियां अमेरिका को भी एक्सपोर्ट की जाती थीं। लेकिन 2014 में अमेरिका बीड़ी को प्रतिबंधित कर दिया गया।
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