Ghazal By Ravi Parashar Baahar se andar jaana रवि पाराशर की ग़ज़ल
Ghazal By Ravi Parashar Baahar se andar jaana रवि पाराशर की ग़ज़ल

बाहर से अंदर जाना,
नीचे से ऊपर जाना।
कोई लम्हे से सीखे,
बेआवाज़ गुज़र जाना।
जब उसका घर देख लिया,
तब फिर और किधर जाना।
हमने ख़ुशबू से सीखा,
खिलना और बिखर जाना।
घर के बस में नहीं रहा,
सही-सलामत घर जाना।
हमने यारो ! हर रस्ते,
शब के बाद सहर जाना।
दरिया में बह लेना भी,
तट के साथ ठहर जाना।
बचपन कितना प्यारा था,
ये जवान हो कर जाना।
यादों की परछांई से,
घबरा कर मत डर जाना।
लहरें मचलें चल-चल-चल,
थमना तो सागर जाना