Gazal By Ravi Parashar वहां न जाना ख़तरा है Ravi Parashar Ki Ghazal रवि पाराशर की ग़ज़ल

Gazal By Ravi Parashar वहां न जाना ख़तरा है Ravi Parashar Ki Ghazal रवि पाराशर की ग़ज़ल

वहां न जाना, ख़तरा है,
वहां पुलिस का पहरा है।

कोई हलचल नहीं वहां,
शायद पानी गहरा है।

मोटी पोथी थोथी है,
मेरे पास ककहरा है।

दो गज़ से भी कम दे दे,
मेरा बदन इकहरा है।

जिस लम्हा वो हंस दी थी,
वक़्त वहीं पर ठहरा है।

आंखों से छलके दरिया,
लेकिन मन में सहरा है।

आया है जो बिकने को,
देखो, मेरा चेहरा है।

उसकी रातें रोती हैं,
दिन तो उसका बहरा है।

दिन सूने ज़्यादातर के,
उनका रोज़ दशहरा है।

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