अफगानिस्तान में भूकंप के मलबे में फंसी महिलाओं को मरने के लिए क्यों छोड़ दिया गया? Why were women trapped in the debris of earthquake in Afghanistan left to die?
अफगानिस्तान में भूकंप के मलबे में फंसी महिलाओं को मरने के लिए क्यों छोड़ दिया गया?
Why were women trapped in the debris of earthquake in Afghanistan left to die?

रवि पाराशर
कौन सा दीन, धर्म, मज़हब और इंसानियत, फ़र्ज़, कर्तव्य का भाव जान बचाने के मामले में पुरुष और महिलाओं में भेदभाव कर सकता है? ज्यादातर लोग कहेंगे कि कोई नहीं। लेकिन अफ़गानिस्तान से जो खबर आई है, वह बेचैनी पैदा करने वाली है। वहां आए भूकंप ने तो पुरुष, महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों, मवेशियों के साथ कोई भेदभाव नहीं किया, जो भी ज़द में आया, मलबे में दब कर जान गंवा बैठा या फिर घायल हो गया, लेकिन वहां के पुरुषों ने क्या किया? उन्होंने इंसानियत को तार-तार कर दिया।
महिलाएं तड़पती रहीं, मदद की गुहार लगाती रहीं
बहुत से लोग मलबे की चपेट में आ कर घायल हो गए, जान बचाने के लिए छटपटाने लगे, लेकिन बचाव के लिए पहुंचे लोगों ने सिर्फ पुरुषों को ही मलबे से निकालने का काम किया। बच्चियों, बहनों, माताओं को हाथ नहीं लगाया, क्योंकि अफ़गानिस्तान के तालिबान शासन में दूसरे परिवारों की महिलाओं को छूने की सख्त मनाही है। वहां महिलाओं को सिर्फ करीबी रिश्तेदार जैसे पिता, भाई, पति और बेटे के अलावा दूसरे पुरुष छू नहीं सकते। इसलिए जीवित घायल महिलाओं और बच्चियों को मलबे में ही फंसे रहने दिया गया। मर चुकी महिलाओं के शव उनके कपड़े पकड़ कर घसीट-घसीट कर निकाले गए।
जो घायल महिलाएं मलबे में फंसी नहीं थीं, उनका भी इलाज नहीं किया गया। उन्हें एक तरफ भेज कर तड़पने के लिए छोड़ दिया गया। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि बचाव और स्वास्थ्य कर्मियों में महिलाएं शामिल थी ही नहीं। तालिबान ने महिलाओं की उच्च शिक्षा पर पाबंदी लगा रखी है। क्योंकि मददगारों में महिलाएं शामिल नहीं थीं, तो जिन बहुत सी महिलाओं की जान बचाई जा सकती थी, वे धार्मिक, सामाजिक कट्टरवाद और दकियानूसीपन की शिकार हो कर तड़प-तड़प कर मर गईं।
इस्लाम में महिलाओं से भेदभाव कितना जायज?
जिस सवाल से इस टिप्पणी की शुरुआत की गई थी, वह फिर दोहराता हूं कि कोई धर्म, दीन, मज़हब या रिलीजन क्या ऐसा भेदभाव करने की इजाजत देता है? एक उत्तर तो है कि हां, देता है। तब ही तो अफगानिस्तान में भूकंपग्रस्त इलाकों में पीड़ित महिलाओं और बच्चियों को मरने या फिर बुरी तरह छटपटाने के लिए छोड़ दिया गया? अब बड़ा सवाल यह है कि अगर इस्लाम में पुरुष और महिलाओं के बीच ऐसे भेदभाव को जायज ठहराया गया है, तो क्या यह किसी भी स्तर पर उचित है? क्या किसी इमरजेंसी के दौरान भी इस तरह का भेदभाव किया जाना चाहिए?
मुस्लिम बुद्धिजीवी क्यों चुप हैं?
इस्लाम के जानकारों को इस बड़े सवाल का स्पष्ट उत्तर देना चाहिए। जहां तक मेरी जानकारी है, भारत समेत मुस्लिम वर्ल्ड से अभी तक इस मामले की किसी तरह की मजम्मत नहीं की गई है। भारत में तो इस तरह का भेदभाव नहीं है। गैर-इस्लामी धर्मों के डॉक्टर मुस्लिम महिलाओं का इलाज करते हैं, उनका ऑपरेशन करते हैं, तो किसी को कोई ऐतराज नहीं होता। तो क्या भारतीय मुस्लिम समुदाय के बुद्धिजीवी अफगानिस्तान में महिलाओं के साथ हुए अमानवीय बर्ताव के विरोध में कुछ बोलेंगे? कम से कम मुस्लिम महिलाओं को तो इस मामले में आवाज बुलंद करने की जरूरत है।
खिलाफत आंदोलन से ले कर अब तक क्या बदला?
आजादी की लड़ाई के दौरान भारतीय मुसलमानों ने साल 1919 में भारत में लखनऊ से शुरू हुए खिलाफत आंदोलन का भरपूर समर्थन किया था। यह आंदोलन तुर्की के खलीफा को ले कर ब्रिटेन की नीति के विरोध में शुरू किया गया था। तुर्की में खलीफा के शासन की बहाली के लिए साल 1924 तक भारत में चले इस आंदोलन को महात्मा गांधी मुस्लिम-हिंदू एकता को बढ़ावा देने के कारगर मंच के तौर पर देख रहे थे।
कितना सही है ऐसी एकता का प्रदर्शन?
लेकिन क्या आज तक ऐसा हो पाया है? इजराइल-हमास के बीच चल रहे युद्ध के दौरान फिलिस्तीन के समर्थन में बहुत से भारतीय मुसलमान बुद्धिजीवी बहसों के तमाम मंचों पर मुखर रहते हैं। मुस्लिम त्योहारों के जलसों और जुलूसों में फिलिस्तीन के झंडे इस्लामिक एकता के नाम पर फहराए जाते हैं। भारतीय लोकतंत्र में क्या ऐसा करना जायज है?
कथित मुस्लिम बुद्धिजीवियों की बात तो छोड़िए, विपक्षी राजनैतिक पार्टियों के कई बड़े नेता भी खुल कर फिलिस्तीन का समर्थन करते नजर आते हैं। फिलिस्तीन का समर्थन करना सिरे से गलत नहीं है, लेकिन हमास की अमानवीय रक्तरंजित करतूत के बाद इजराइली प्रतिक्रिया के विरोध में ऐसा करना बिल्कुल सही नहीं हो सकता।
क्या सही है वैश्विक संस्थाओं का दोहरा रवैया?
मानवीयता या इंसानियत के झंडाबरदार मानवाधिकारों की दलील दे कर फिलिस्तीन का समर्थन करते हैं, तो वे हमास की हिंसा के विरोध में क्यों कुछ नहीं बोलते? हमास इजराइली नागरिकों की जान ले ले या अपहरण कर उन्हें यातनाएं दे, तो क्या यह सही है? मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाली वैश्विक या स्थानीय संस्थाओं के इस एकतरफा दोहरे रवैये की कड़ी निंदा की जानी चाहिए।
इंसानियत की बात करने वाले लोग अफगानिस्तान में भूकंप पीड़ित मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की बात क्यों नहीं कर रहे हैं? कहीं से कोई आवाज क्यों नहीं उठ रही है? अफ़गानी मुस्लिम महिलाएं क्या मानव की वैश्विक परिभाषा के अंतर्गत नहीं आतीं?
महिलाओं के हक छीनने से क्या मिलेगा?
अगस्त, 2021 से अफ़गानिस्तान में तालिबान का शासन चल रहा है और तब से ही वहां महिलाओं के बहुत से अधिकारों पर कड़ी पाबंदियां जारी हैं। वहां महिलाएं छठवीं तक ही पढ़ाई कर सकती हैं। ज्यादातर नौकरियां महिलाओं के लिए वर्जित हैं। वे परिवार के पुरुष के साथ ही कहीं सफर कर सकती हैं।
तालिबानी शासन के शुरुआती दिनों में बहुत सी अफगानी महिलाओं ने अपने हकों के लिए सड़कों पर उतर कर आंदोलन किए थे, लेकिन उन्हें सख्ती से कुचल दिया गया। बड़ा सवाल यह है कि महिलाओं को ले कर क्या यह रवैया तालिबान की निजी सोच से जुड़ा है या फिर इस्लाम इस तरह की व्यापक अमानवीय क्रूरता की इजाजत देता है?
सऊदी अरब क्यों कर पा रहा है सुधार?
फिर बड़ा सवाल यह भी है कि अगर इस्लाम में महिलाओं के अधिकार सीमित और संकुचित किए गए हैं, तो फिर सऊदी अरब महिलाओं के लिए आजादी के कुछ झरोखे क्यों खोल पा रहा है? क्या सऊदी अरब कट्टर मान्यताओं और परंपराओं को दरकिनार कर इस्लामिक आधार से विचलित हो रहा है? अगर यह संभव है तो फिर ज्यादातर मुस्लिम बुद्धिजीवी आज की सभ्य दुनिया में इस्लाम की मान्यताओं में किसी तरह के बदलाव या विचलन की हिमायत दबी जुबान से भी क्यों नहीं कर पाते?
कुरीतियां आज के समय में क्यों जारी हैं?
विशुद्ध मुस्लिम देश सऊदी अरब महिलाओं के हकों में इजाफा कर रहा है, तो भारत के ज्यादातर मुस्लिम बुद्धिजीवी एक साथ तीन तलाक और हलाला जैसी कुरीतियों को दूर कर सुधारवादी रवैया क्यों नहीं अपना सकते? जब इस्लाम पनपा, तब के और आज के हालात में जमीन-आसमान का अंतर है। दुनिया बर्बरता को छोड़ कर बहुत ज्यादा सभ्य और लोकतांत्रिक हुई है। ऐसे में कुरीतियों को दूर करना बहुत जरूरी है।
तालिबान का मतलब क्या है?
पश्तो भाषा में तालिब का अर्थ होता है ज्ञान की खोज में रहने वाला यानी छात्र। तालिबान, तालिब का बहुवचन है। इस तरह हम तालिबान का मतलब हुआ- पढ़ने-लिखने वाले व्यक्तियों का समूह। पढ़ा-लिखा कोई समाज या संगठन महिलाओं के पढ़ने-लिखने पर पाबंदी लगाए, तो आप क्या कहेंगे? जरा सोचिए कि तालिबान के चार साल के शासन में अगर अफगानिस्तान की बहुत सी बेटियां उच्च शिक्षा हासिल कर डॉक्टर या स्वास्थ्य कर्मी बन गई होतीं, तो भूकंप पीड़ित इलाकों में बहुत सी बहन-बेटियों की जान बचा ली गई होती।
वैसे सवाल तो ऐसे नियम-कायदों पर ही उठाए जाने चाहिए, जिनके तहत बुरी तरह घायल या किसी और इमरजेंसी में घिरी किसी महिला को कोई पुरुष बचाव और स्वास्थ्यकर्मी छू ही नहीं सकता। सड़क हादसों में किसी के घायल होने पर तो आम आदमी ही शुरुआती मदद करते हैं, घायलों को अस्पताल ले जाते हैं। ऐसे में पुरुष और महिलाओं के बीच इस तरह का भेदभाव मानवता के पूरी तरह विरुद्ध है। अफगानिस्तान की खबर न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी प्रकाशित की है। भारतीय प्रिंट मीडिया की नजर भी इस पर पड़ी है। लेकिन भारत समेत दुनिया में कोई सकारात्मक हल्ला नहीं हुआ। क्या यह सही वक्त नहीं है कि जब इस मसले को विमर्श का बड़ा अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाया जाए? जरा सोचिए!
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