Ghazal by Ravi Parashar ख़ुश्क लबों पर ख़ामोशी से सहरा-सहरा हर कोई
Ghazal by Ravi Parashar ख़ुश्क लबों पर ख़ामोशी से सहरा-सहरा हर कोई

1
ख़ुश्क लबों पर ख़ामोशी से सहरा-सहरा हर कोई,
नदी, समंदर सब हैं, लेकिन प्यासा-प्यासा हर कोई।
सहमी सुबहें, ज़र्द दुपहरी, नींद न आना रातों को,
अफ़वाहों के बियाबान में नया ख़ुलासा हर कोई।
एहसासों के सब्ज़ दरख़्तों के सब पंछी फुर्र हुए,
काट रहा है उनकी डालें, टुकड़ा-टुकड़ा हर कोई।
सिर्फ़ हमामों की बातें तो कब की यार तमाम हुईं,
गलियों, नुक्कड़, चौराहों पर नंगा-नंगा हर कोई।
अख़बारों में और टीवी पर सिर्फ़ नफ़रतों की ख़बरें,
सुबह-सुबह ही हो जाता है, बासा-बासा हर कोई।
2
सिर्फ़ सिलवटों के बिस्तर पर सोया-सोया हर कोई,
सपनों के बाज़ार सजे हैं, खोया-खोया हर कोई।
ख़्वाहिश के घर मची हुई है इतनी अफ़रा-तफ़री क्यों ?
सोचे मन के दरवाज़े पर, ठिठका-ठिठका हर कोई।
बीवी-बच्चों की उम्मीदें गर्म तवों पर बैठी हैं,
बूंद-बूंद कर टपक रहा है, लम्हा-लम्हा हर कोई।
तुलसी का आंगन मुद्दत से कितना सूना-सूना है,
घर में लोग बहुत हैं, लेकिन कमरा-कमरा हर कोई।
सन्नाटों में डूब-डूब कर हमने बहुत शोर देखा,
हमने देखा भीड़भाड़ में तन्हा-तन्हा हर कोई।