Ghazal by Ravi Parashar जायेगी लग ठोकर देख
Ghazal by Ravi Parashar जायेगी लग ठोकर देख कर

जाएगी लग ठोकर देख,
नीचे, नज़रें धो कर देख।
ख़ुशी नहीं, तो ग़म कैसा,
सपने सिर्फ़ संजो कर देख।
उससे ही उम्मीद न कर,
ख़ुद भी उसका हो कर देख।
हरियाली झाड़ी की छोड़ !
सड़क के गड्ढे-गोबर देख।
आज तू कितना तन्हा है,
भीड़ के अंदर रो कर देख।
असली सपने क्या हैं यार,
फुटपाथों पर सो कर देख।