Bihar Elections 2025: If the keys to power fall into the hands of coalition partners, it will not be good for the health of Bihar बिहार चुनाव 2025: सत्ता की चाबी अगर गठबंधनों के सहयोगियों के हाथ में आई, तो बिहार की सेहत के लिए ठीक नहीं होगा
Bihar Elections 2025: If the keys to power fall into the hands of coalition partners, it will not be good for the health of Bihar
बिहार चुनाव 2025: सत्ता की चाबी अगर गठबंधनों के सहयोगियों के हाथ में आई, तो बिहार की सेहत के लिए ठीक नहीं होगा

रवि पाराशर
बिहार में विधानसभा चुनाव प्रक्रिया चल रही है। आगामी 14 नवंबर यानी बाल दिवस को नतीजे आने हैं। सरकार महागठबंधन की बनेगी या एनडीए 20 साल बाद भी रिपीट होगी, यह अभी कहा नहीं जा सकता। लेकिन सरकार किसी न किसी गठबंधन की ही बनेगी, इस पर तो कोई विवाद है ही नहीं। दोनों ही खेमों की पार्टियों में ज्यादा से ज्यादा सीटें हासिल करने के लिए होड़ मची हुई है।
कोई नेता सीटों के साथ-साथ मंत्रिपरिषद में पद के लिए अभी से अखाड़ेबाजी कर रहा है, तो कोई कम सीटें मिलने पर अपमान की बात कह रहा है। वह तर्क भी दे रहा है कि जिस पार्टी का कोई विधायक मौजूदा विधानसभा में नहीं है, वह ज्यादा सीटें मांग रहा है और उसे दरकिनार कर अपमानित किया जा रहा है। कुल मिला कर, बिहार में जो भी सरकार आगे जा कर बनने वाली है, अभी तो ऐसा ही लग रहा है कि वह भी मजबूरी वाली सरकार ही होगी।
ऐसे में सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल पार्टियों की निजी स्वार्थी महत्वाकांक्षाओं में फंसे बिहार के विकास के फैसले किस तरह लिए जाएंगे, यह महसूस करना मुश्किल नहीं है। जाहिर है कि जो छोटी-छोटी पार्टियां या कहें कि निजी पारिवारिक पार्टियां अभी ज्यादा और मनपसंद सीटों के लिए तमाम तरह के दांव-पेंच दिखा रही हैं, गठबंधन छोड़ देने तक के संकेत दे रही हैं, तरह-तरह की घुड़कियां दे रही हैं, वे सरकार में शामिल होने पर महत्वपूर्ण विभागों पर कब्जे के लिए भी ऐसा ही करेंगी और बहुत हद तक कामयाब भी हो जाएंगी।
महत्वपूर्ण विभागों के लिए मलाईदार विशेषण ऐसे ही नहीं इस्तेमाल किया जाता है। मलाईदार विभाग का सीधा मतलब हुआ मलाई पैदा करने वाले विभाग। मलाई खाता कौन है? क्या वह जनता को मिलती है? जी नहीं, जनता का मलाई से क्या लेना-देना? मलाई वही खाता है, जो विभाग का मुखिया हो या उसके मातहत लोग उसे खाते हैं। राज्यों की गठबंधन सरकारों पर मुख्यमंत्रियों का नियंत्रण कितना रह पाता है, यह किसी से छिपा नहीं है। हम जानते हैं कि केंद्र में यूपीए सरकार के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तो गठबंधन की मजबूरी का जिक्र मीडिया के सामने खुल कर किया ही था।
कुल मिला कर, साफ है कि अभी वह दौर नहीं आया है, जब बिहार के निर्बाध विकास का सिलसिला शुरू हो सके। असल में विकास सतत प्रक्रिया है। सरकार कोई भी हो, विकास की कम से कम रफ्तार हर वक्त कायम रहती ही है। उन सरकारों को लोग अच्छी मानते हैं, जो विकास की रफ्तार को तेज करती हैं। ऐसी सरकारों को आम लोग एक या कई बार रिपीट भी करते हैं। केंद्र में मोदी सरकार, यूपी में योगी सरकार और बिहार में नीतीश कुमार सरकार इसके अच्छे और सटीक उदाहरण हैं।
यहां तक पढ़ने के बाद आप सोच रहे होंगे कि जो तर्क मैं दे रहा हूं, उस हिसाब से तो पिछले 20 साल से बिहार में गठबंधन सरकारों का ही राज रहा है, इसलिए राज्य का विकास स्वाभाविक रफ्तार से नहीं हो रहा है। जी हां, सिद्धांतत: यह बात बिल्कुल ठीक है। हालांकि बहुमत का आंकड़ा दोनों बड़ी पार्टियां ही करीब-करीब पूरा कर लेती हैं, इसलिए सहयोगी पार्टियों की धौंस उन्हें नहीं झेलनी पड़ रही है। दूसरी तरफ केंद्र में भी उस गठबंधन की ही सरकार है, जिसकी सरकार बिहार में है, इसलिए राज्य में विकास की रफ्तार उतनी धीमी नहीं है, जितनी तार्किक तौर पर होनी चाहिए थी, क्योंकि केंद्र सरकार भी बिहार का ध्यान रखती है।
अब बात करते हैं केंद्र की मोदी सरकार की। केंद्र में भी हालांकि गठबंधन की सरकार ही है, लेकिन उसके बारे में ऐसा तर्क नहीं दिया जा सकता। क्योंकि भारतीय जनता पार्टी को सरकार में निर्णायक बढ़त हासिल है, इसलिए गठबंधन में शामिल पार्टियों को वहां मनमर्जी करने के लिए छूट बिल्कुल नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्ता पर पूरी और एकतरफा निर्णायक पकड़ है, इसलिए कोई सहयोगी आंखें तरेरने की हिम्मत तक नहीं कर सकता।
बिहार की राजनैतिक स्थितियों को देखें, तो विधानसभा में कुल 243 सीटें हैं। इस लिहाज से बहुमत का आंकड़ा होता है 122 सीटें। एनडीए की बात करें और मोटे तौर पर मान लें कि बीजेपी और जेडीयू करीब-करीब 100 या 100 प्लस सीटों पर चुनाव लड़ती हैं, तो करीब 40 इससे कुछ ज्यादा सीटें उन्हें गठबंधन में शामिल पार्टियों को देनी होंगी। साल 2020 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी और जेडीयू ने कुल 117 सीटें जीती थीं, लेकिन गठबंधन का आंकड़ा 125 तक पहुंच गया था। इस बार सत्ता की चाबी अगर क्लियरकट गठबंधन के सहयोगियों के हाथ आ गई, तो सरकार की बंदरबांट थोड़ी मुश्किल हो सकती है और ऐसा बिहार की सेहत के लिए ठीक नहीं होगा।
इसी तरह महागठबंधन में ऐसा हुआ, तो आरजेडी के लिए एकछत्र राज का सपना पूरा नहीं होगा। कुल मिला कर, बिहार में जब तक एक पार्टी या ज्यादा से ज्यादा दो पार्टियों का दबदबा पूरी तरह कायम नहीं होगा, तब तक बिहार के दिन पूरी तरह नहीं बहुरेंगे। एनडीए में तो कोई पार्टी बहुमत से ज्यादा सीटों पर लड़ नहीं रही है, लेकिन महागठबंधन में ऐसा नहीं है। आरजेडी का बहुमत से ज्यादा सीटों पर लड़ना तय सा है। चमत्कार हुआ, तो वह अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में होगी और इसके बाद बिहार की राजनीति नई करवट ले सकती है। लेकिन चमत्कार बहुत कम होते हैं और अभी तक के राजनैतिक कयास एनडीए की वापसी के ही हैं।
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