Ghazal By Ravi Parashar मौसम वैसे तो अच्छा है, थोड़ा बहका-बहका है
Ghazal By Ravi Parashar मौसम वैसे तो अच्छा है, थोड़ा बहका-बहका है

मौसम वैसे तो अच्छा है, थोड़ा बहका-बहका है,
पंछी का मन सोच रहा है-पहले कब-कब चहका है।
दावे से कह सकता हूं मैं, मरा नहीं हूं ज़िंदा हूं,
ख़्वाब में उसको जब भी देखा, दिल में कुछ-कुछ धड़का है।
दूध रात को, मट्ठा दिन में रोज़ पिलाती थी अम्मा,
अच्छे दिन की उम्मीदें हैं, अब गिलास ख़ाली सा है।
बड़ी मुसीबत झेल-झाल कर, वो महफ़िल में पहुंच गया,
पता नहीं वो क्यों उदास है, घर पर जब से पहुंचा है।
जितना अपने पास बचा था, खुल कर हमने दे डाला,
पर जब वापस मांगा, तो ख़ुदगर्ज़ हमीं को कहता है।
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