Durga puja ka itihas kya hai? दुर्गा पूजा का इतिहास क्या है?
Durga puja ka itihas kya hai? दुर्गा पूजा का इतिहास क्या है?

दुर्गा पूजा भारत के सबसे प्रमुख और व्यापक रूप से मनाए जाने वाले त्योहारों में से एक है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। माँ दुर्गा की आराधना को समर्पित यह उत्सव शक्ति, सत्य और धर्म की स्थापना के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। विशेष रूप से बंगाल, असम, ओडिशा, बिहार, झारखंड और त्रिपुरा में यह पर्व एक सांस्कृतिक उत्सव का रूप ले चुका है, जबकि देश के अन्य हिस्सों में भी अब इसका व्यापक आयोजन होने लगा है।

दुर्गा पूजा का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह पूजा देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर के वध की स्मृति में की जाती है। महिषासुर, जो एक शक्तिशाली असुर था, उसने देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने मिलकर अपनी शक्तियों से देवी दुर्गा का निर्माण किया, जिन्होंने नौ दिनों और दस रातों तक महिषासुर से युद्ध कर अंततः उसका वध किया। इस विजय को अधर्म पर धर्म की जीत माना गया और तभी से माँ दुर्गा को शक्ति की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजा जाने लगा।
इतिहासकारों की मानें तो दुर्गा पूजा की शुरुआत बंगाल में 16वीं सदी में हुई थी। शुरुआत में यह पूजा ज़मींदारों और राजाओं द्वारा निजी रूप से आयोजित की जाती थी। 18वीं शताब्दी में नबाब सिराजुद्दौला के शासनकाल के दौरान, कोलकाता के सोभावाजार राजबाड़ी में राजा नवकृष्ण देब ने दुर्गा पूजा का भव्य आयोजन किया, जिसमें ब्रिटिश अफसर भी शामिल हुए थे। यह आयोजन सामाजिक और सांस्कृतिक संपर्क का माध्यम बना और यहीं से सामूहिक पूजा की परंपरा धीरे-धीरे शुरू हुई।
19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी की शुरुआत में दुर्गा पूजा एक जन-आंदोलन का भी रूप ले चुकी थी। जब देश स्वतंत्रता संग्राम की आग में जल रहा था, तब दुर्गा पूजा के पंडाल जनजागरण और राष्ट्रभक्ति के मंच बन गए। प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक दुर्गा पूजा के मंचों का उपयोग जनता में देशप्रेम और एकता का भाव भरने के लिए करते थे। विशेष रूप से बंगाल में दुर्गा पूजा ने राजनीतिक और सांस्कृतिक चेतना को स्वर देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
समय के साथ दुर्गा पूजा का स्वरूप भी बदलता गया। आज यह पूजा न केवल धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि कला, संस्कृति, संगीत, नृत्य, रंगमंच और समाज सेवा का महोत्सव बन चुकी है। देश के विभिन्न हिस्सों में दुर्गा पूजा का आयोजन अपनी-अपनी सांस्कृतिक विशेषताओं के साथ होता है। कोलकाता में दुर्गा पूजा एक अद्भुत अनुभव है। यहाँ के पंडालों की भव्यता, मूर्तियों की कलात्मकता और आयोजनों की विविधता विश्व प्रसिद्ध है। प्रत्येक पंडाल एक विशेष थीम पर आधारित होता है—कभी सामाजिक संदेशों पर, तो कभी ऐतिहासिक स्थलों या समकालीन मुद्दों पर। मूर्तिकार महीनों पहले से काम में जुट जाते हैं और उनकी बनाई मूर्तियाँ किसी जीवंत अनुभव से कम नहीं होतीं।
कोलकाता में कुम्हारटोली नामक इलाका विश्वप्रसिद्ध है, जहाँ माँ दुर्गा की मूर्तियाँ बनाई जाती हैं। मिट्टी, भूसे, लकड़ी और रंगों से बनी ये मूर्तियाँ न केवल बंगाल में बल्कि देश-विदेश तक भेजी जाती हैं। यहाँ मूर्तियों को बनाते समय पहले एक विशेष मिट्टी का उपयोग होता है, जो कोलकाता के गंगा घाट से लाई जाती है और जिसे ‘पवित्र मिट्टी’ माना जाता है। इस मिट्टी को ‘निर्वाण माटी’ कहा जाता है, जो समाज के सभी वर्गों को जोड़ने का प्रतीक भी बन गया है।
बंगाल के अलावा असम में भी दुर्गा पूजा बेहद उत्साह के साथ मनाई जाती है। गुवाहाटी, जोरहाट, डिब्रूगढ़ आदि शहरों में भव्य पंडाल सजते हैं और पाँच दिनों तक सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम रहती है। ओडिशा के कटक शहर की दुर्गा पूजा खास तौर पर प्रसिद्ध है, जहाँ चाँदी की पत्तियों से पंडाल सजाए जाते हैं, जिन्हें ‘चांदी का रथ’ कहा जाता है। यहाँ की पूजा में शिल्पकला और पारंपरिक संगीत का विशेष योगदान होता है।
बिहार और झारखंड में दुर्गा पूजा सामाजिक एकजुटता और सामुदायिक सहयोग का प्रतीक बन गई है। यहाँ की पूजा में धार्मिक रस्मों के साथ-साथ सांस्कृतिक प्रतियोगिताएँ, जैसे नृत्य, गायन, नाटक और क्विज़ भी आयोजित किए जाते हैं। पटना, गया, धनबाद, रांची और जमशेदपुर में दुर्गा पूजा बहुत ही भव्य तरीके से मनाई जाती है।
उत्तर भारत में भी दुर्गा पूजा का विस्तार हो चुका है। पहले जहाँ यहाँ दशहरा और रामलीला का अधिक प्रभाव था, अब बड़े शहरों जैसे दिल्ली, लखनऊ, कानपुर और वाराणसी में दुर्गा पूजा समितियाँ सक्रिय हैं और बंगाली समाज के अलावा स्थानीय लोगों की भी भागीदारी बढ़ी है। दिल्ली के चित्तरंजन पार्क, कालीबाड़ी और कश्मीरी गेट जैसे स्थान दुर्गा पूजा के प्रमुख केंद्र बन चुके हैं।
पश्चिम भारत में विशेषकर मुंबई और पुणे में रहने वाला बंगाली समुदाय दुर्गा पूजा को बड़े उत्साह के साथ मनाता है। यहाँ पूजा के दौरान बॉलीवुड कलाकार भी पंडालों में दर्शन के लिए आते हैं, जिससे आयोजन और भी आकर्षक बन जाता है। दक्षिण भारत में, खासकर बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद जैसे महानगरों में, प्रवासी बंगालियों की संख्या अधिक होने के कारण दुर्गा पूजा का आयोजन बड़े स्तर पर होता है और यह पूजा अब स्थानीय संस्कृति के साथ समन्वय बनाकर नई पहचान बना चुकी है।
देशभर में दुर्गा पूजा केवल देवी की आराधना तक सीमित नहीं है। यह एक सांस्कृतिक आंदोलन बन चुका है, जिसमें सामाजिक समरसता, कलात्मक अभिव्यक्ति, और जन-जागरण के अनेक पहलू जुड़ते हैं। पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण, स्वच्छता, स्वास्थ्य, और शिक्षा जैसे विषयों को भी अब पंडालों की सजावट और थीम के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। बहुत से पूजा समितियाँ अब प्लास्टिक मुक्त पंडाल, इको-फ्रेंडली मूर्तियाँ, और डिजिटल आरती जैसी पहलों को अपना रही हैं।
दुर्गा पूजा के अंत में विजयादशमी का पर्व आता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस दिन देवी की मूर्तियों का विसर्जन किया जाता है। बंगाल में इसे ‘बिजया’ कहा जाता है, जहाँ लोग एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर और गले मिलकर शुभकामनाएँ देते हैं। यह केवल एक पर्व का अंत नहीं होता, बल्कि एक नए सामाजिक संवाद की शुरुआत होती है।
दुर्गा पूजा आज न केवल एक धार्मिक त्योहार है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की विविधता, सामाजिक समरसता और रचनात्मकता का प्रतीक बन चुका है। यह पर्व हर वर्ष हमें यह याद दिलाता है कि जब-जब अधर्म बढ़ेगा, तब-तब माँ दुर्गा जैसी शक्ति का उदय होगा, जो अंधकार को मिटाकर प्रकाश का मार्ग प्रशस्त करेगी। देश के हर कोने में मनाया जाने वाला यह त्योहार हमें एक सूत्र में बाँधता है और हमारी साझी सांस्कृतिक विरासत का उत्सव बन जाता है।