The world is completely divided against terrorist thinking, isn’t boycotting Israel a support for Hamas? आतंकी सोच के विरोध में पूरी तरह बंटी हुई है दुनिया, इजराइल का बहिष्कार क्या हमास का समर्थन नहीं है?
The world is completely divided against terrorist thinking, isn’t boycotting Israel a support for Hamas?
आतंकी सोच के विरोध में पूरी तरह बंटी हुई है दुनिया, इजराइल का बहिष्कार क्या हमास का समर्थन नहीं है?

रवि पाराशर
इजराइल के प्रधानमंत्री बेंन्यामिन नेतन्याहू के संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण के दौरान हुई प्रतिक्रिया ने साफ कर दिया है कि आतंकवाद को ले कर दुनिया दो धड़ों में बंटी हुई है। होना तो यह चाहिए था कि आतंक के रास्ते पर चल कर अपना दबदबा कायम करने की सोच को दुनिया के सभी देश सिरे से नकारें, लेकिन जब नेतन्याहू भाषण देने के लिए खड़े हुए, तो 100 से ज्यादा देशों के नुमाइंदे हॉल से बाहर चले गए। यह संख्या संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों की करीब-करीब आधी है।
ऐसे सभी देशों ने गाजा पर इजराइल के हमलों की आलोचना करते हुए युद्ध विराम की मांग की। सही है कि दो देशों या देशों के दो गुटों में अनंत काल के लिए युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। एक हद के बाद युद्ध रुकना ही चाहिए, क्योंकि इससे बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का उल्लंघन होने लगता है। लेकिन कोई भी युद्ध क्यों शुरू हुआ, इसकी भी विश्वव्यापी और तटस्थ पड़ताल होनी चाहिए। नेतन्याहू के भाषण के बहिष्कार में शामिल सभी देश क्या हमास या ऐसे ही दूसरे आतंकी गुटों की हिंसा का समर्थन करते हैं?
अगर नहीं, तो पूरी दुनिया को हमास या दूसरे आतंकी गुटों की निंदा एक आवाज में खुल कर करनी चाहिए। दुर्भाग्य की बात है कि तमाम धड़ों में बंटी दुनिया से आतंक के विरोध में स्वर एक जैसे तेवर के साथ नहीं उभरते। छोटे देशों की बात तो छोड़िए, अमेरिका, चीन और रूस जैसे देश भी एक-दूसरे पर हावी रहने के लिए आतंकवाद के मसले पर सिलेक्टिव रवैया अपना रहे हैं।
आतंक की सबसे बड़ी चोट महसूस करने वाले अमेरिका का आतंकवाद को ले कर दोहरा रवैया अक्सर सामने आता रहा है। आप अगर सरकारी तौर पर आतंक की फैक्टरी चलाने वाले देश पाकिस्तान को पुचकारते ही रहेंगे, उसकी सीधी मदद करते रहेंगे, तो आप आतंक का विरोध किस तरह कर रहे हैं? आप तो सीधे तौर पर आतंक को संरक्षण दे रहे हैं।
जो बाइडेन के शासन काल में जब अमेरिका और नाटो सेनाओं ने अफगानिस्तान छोड़ा, तो तमाम युद्धक सामग्री वहीं छोड़ दी। प्रचार किया गया कि सारी युद्धक सामग्री को डिसएबल कर दिया गया है, ताकि उसका इस्तेमाल नहीं किया जा सके। लेकिन हकीकत क्या है, सभी जानते हैं। तालिबान ने उस युद्धक सामग्री का प्रयोग किया और अब भी कर रहे हैं। अब डोनाल्ड ट्रंप उसी बगराम एयरबेस को वापस पाना चाहते हैं, ताकि पूरे क्षेत्र पर दबदबा कायम रख सकें।
सीधी और साफ बात यही है कि आतंक के विरोध का मतलब सिर्फ और सिर्फ विरोध ही होना चाहिए। अपनी सहूलियत के हिसाब से इसमें कोई नर्मी नहीं होनी चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होगा, आतंकवाद के विरोध में लड़ाई में दुनिया को अंतिम जीत हासिल नहीं होगी।
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