Ghazal by Dr. Surendra Singhal बस आदतन ही सभी की उंगली शहर में मेरी तरफ उठी है
Ghazal by Dr. Surendra Singhal बस आदतन ही शहर में सबकी उंगली मेरी तरफ उठी है

डॉ. सुरेंद्र सिंघल की ग़ज़ल
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बस आदतन ही सभी की उंगली शहर में मेरी तरफ उठी है,
वगरना ये सोचना ही पड़ता कि मुझमें ऐसी भी क्या कमी है।
मैं काफ़ी ऊपर से कूद बैठा कि गहरी होगी, बड़ी नदी है
मैं देख पाया नहीं कि उस पर बरफ़ की मोटी परत जमी है।
ये भीड़ इक दिन जुलूस बन कर हिसाब लेगी सितमगरों से,
ये ख्वाब मेरा है, तुम भी देखो, दिखाओ सबको, ये लाज़मी है।
क़िला है पुख़्ता मैं मानता हूं, क़िले के चारों तरफ है खाई,
फिर एक ख़ुफ़िया सुरंग क्यों है, जो बच निकलने को ही बनी है।
खुली हुई छत पे तुमने अपनी बनाए कमरे किराये वाले,
हमारे आंगन की धूप, लाला, तुम्हारे लालच ने छीन ली है।
मैं चाहता हूं कि मेरे बच्चे वो सब न देखें, जो मैंने देखा,
बस इसलिए ही तो मेरे माता-पिता से मेरी तनातनी है।
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