वरुण क़ायदे में रहोगे,तो फायदे में रहोगे

वरुण क़ायदे में रहोगे, तो फायदे में रहोगे

BJP ने लगाया ठिकाने
वरुण ने टेके घुटने

लगता है वरुण गांधी ने वो सबक सीख लिया है जो बीजेपी उन्हें सिखाना चाहती थी. ये सबक था कायदे में रहोगे तो फायदे में रहोगे. शायद ये बात अब वरुण गांधी को अच्छे से समझ आ गई है.

कई मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि वरुण गांधी की टीम ने बताया है कि वरुण खुद चुनाव ला लड़कर अपनी मां मेनका गांधी को चुनाव जिताने में मदद करेंगे.

पीलीभीत से बीजेपी का टिकट ना मिलने पर चुनाव ही ना लड़ने का वरुण का फैसला बताता है कि शायद वो अपना पॉलिटिकल करीयर बचाने में कामयाब हो जाएंगे.

पिछले कुछ बरसों में वरुण गांधी बहके ज़रूर थे लेकिन लगता है कि उन्होंने आखिरी समय पर पीलीभीत से चुनाव ना लड़ने का फैसला करके अपनी पॉलिटिकल बर्बादी को रोक दिया है.

अगर वरुण गांधी बीजेपी से बगावत को एक हद से आगे बढ़ाते तो वो ना सिर्फ़ उनके लिए बल्कि उनकी मां मेनका गांधी की राजनीति के लिए भी नुकसानदायक होता.

तीन बार के सांसद वरुण गांधी अपनी सांसदी और गांधी सरनेम के घमंड में उड़ने तो लगे थे. लेकिन बीजेपी के दांव ने उन्हें ज़मीन पर लाकर चित्त कर दिया है.

बीजेपी ने सुल्तानपुर से वरुण की मां मेनका गांधी को लोकसभा का टिकट देकर और पीलीभीत से वरुण का टिकट काटकर उन्हें घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया.

दरअसल वरुण गांधी की सियासी गाड़ी डगमगाने की शुरूआत 2017 में तब हुई थी जब उत्तर प्रदेश में बीजेपी सरकार बनाने जा रही थी. गांधी सरनेम के घमंड में वरुण गांधी चाहते थे कि पार्टी उन्हें सीएम उम्मीदवार के तौर पर प्रोजेक्ट करे.

2017 के चुनाव से पहले बीजेपी के पास पूरे प्रदेश में लोकप्रिय योगी आदित्यनाथ जैसा चेहरा भी था लेकिन बीजेपी ने योगी तक को मुख्यमंत्री उम्मीदवार के तौर पर प्रोजेक्ट नहीं किया था तो फिर वरुण गांधी को तो सीएम कैंडिडेट बनाने का सवाल ही नहीं था.

तब तक वरुण सिर्फ दो बार के सांसद थे और अपनी सीट जीतने के अलावा पार्टी का जनाधार बढ़ाने में उनका कोई ख़ास योगदान नहीं था जबकि योगी आदित्यनाथ की अपील पूरे यूपी और देश भर में थी और है.

बीजेपी वरुण गांधी के रवैये से तब से ही नाराज़ थी. पार्टी में सवाल थे कि जब योगी आदित्यनाथ जैसा नेता खुद को सीएम कैंडिडेट बनाने की मांग नहीं कर रहा तो फिर वरुण गांधी क्या चीज़ हैं.

पिछले कुछ बरसों में वरुण ने बीजेपी पर दबाव बनाने के लिए लगातार ऐसे बयान दिये जिससे लगा कि वो बीजेपी से बाहर अपनी राजनीतिक संभावनाएं तलाश रहे हैं. वरुण गांधी ये भूल गये थे कि जिस सांसदी के दम पर वो अनाप शनाप बयान दे रहे हैं वो सांसदी उन्हें बीजेपी की बदौलत ही मिली है.

वरुण गांधी की बयानबाज़ी से खुश बीजेपी की विरोधी पार्टियों ने भी दूसरे के घर में लगी आग से हाथ सेंकने में कोई कसर नहीं छोड़ी. ये पार्टियां हर हाल में वरुण के बीजेपी से दूर करना चाहती थीं. जब तक पीलीभीत से वरुण का टिकट काटा नहीं गया था तब तक सपा से पीलीभीत के उम्मीदवार भगवत शरण गंगवार दावा कर रहे थे कि अगर बीजेपी पीलीभीत से वरुण को टिकट नहीं देगी तो वो अपना टिकट छोड़कर वरुण के लिए मैदान खाली कर देंगे. दरअसल ये वरुण गांधी को बहकाने और कन्फ्यूज़ करने की रणनीति थी क्योंकि जैसे ही बीजेपी ने वरुण का टिकट काटा, सपा के उम्मीदवार भगवत शरण गंगवार अपनी बात से मुकर गये. उन्होंने कहा कि चुनाव वो खुद लड़ेंगे और वरुण गांधी उन्हें चुनाव जिताने के लिए मदद करेंगे.

यानी जैसे ही बीजेपी ने वरुण का टिकट काटा सपा ने भी अपने दरवाज़े वरुण के लिए बंद कर लिए. इसी तरह अधीर रंजन चौधरी की तरफ़ से भी वरुण को कांग्रेस में शामिल होने का न्योता तो दिया गया लेकिन अधीर रंजन चौधरी भी ये अच्छी तरह जानते हैं कि राहुल गांधी और उनकी टीम कभी भी वरुण गांधी को कांग्रेस में शामिल नहीं होने देगी.

इन सारी परिस्थितियों को देखकर वरुण गांधी को समझ आ गया कि कांग्रेस और सपा के चक्कर में कहीं वो घनचक्कर बन कर ना रह जाए. इसके अलावा वरुण के पास एक विकल्प निर्दलीय चुनाव लड़ने का भी था लेकिन उन्हें अच्छे से पता था कि सपा और कांग्रेस के समर्थन के बिना उनका निर्दलीय सांसद बनना मुश्किल होगा. वरुण को ये भी समझ आया कि वो निर्दलीय लड़कर भले ही बीजेपी को एक सीट का नुकसान कर दें लेकिन उससे ना तो यूपी में बीजेपी को को फर्क पड़ने वाला है और ना देशभर में. उनके निर्दलीय लड़ने से उनकी मां की राजनीति अलग खराब होगी.

आखिरी बात जो वरुण गांधी को समझ आई वो ये कि आज की बीजेपी वो पार्टी है जो हर चुनाव में दस बीस तीस पर्सेंट सांसदों और विधायकों के टिकट काटकर भी आसानी से सत्ता हासिल कर लेती है. इससे पहले भी कल्याण सिंह, उमा भारती, बाबू लाल मरांडी, येडियुरप्पा, जगदीश शेट्टार और ना जाने कितने ऐसे नेता हैं जो बीजेपी से अलग हुए और बाद में उन्हें हारकर बीजेपी में ही वापस आना पड़ा. जब इन बड़े नेताओं की भी पार्टी से अलग रहकर सियासत ज्यादा चल नहीं पाई तो वरुण का कद तो इन नेताओं के मुकाबले बहुत छोटा है.

वरुण गांधी ने अच्छा किया कि समय रहते शांत हो गये. अब अगर बीजेपी लीडरशिप की कृपा हुई तो ज़रूर उन्हें पार्टी हित में किसी ना किसी रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है और उनका राजनीतिक भविष्य भी सुरक्षित रह सकता है. 

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