खुल गई मौर्य की दुकान | बेटे-बेटी के लिए डिमांड?

खुल गई मौर्य की दुकान बेटे-बेटी के लिए डिमांड?

समाजवादी पार्टी के नेताओं द्वारा पागल डिक्लेयर किये जा चुके स्वामी प्रसाद मौर्य चुनावी मौसम में एक बार फिर अपनी दुकान सजा कर तैयार हो गये हैं.

हालात कुछ-कुछ वैसे ही हैं जैसे जनवरी 2022 में थे. 2022 की शुरुआत तक स्वामी प्रसाद मौर्य बीजेपी के साथ थे और योगी आदित्यनाथ की उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री थे. जनवरी 2022 में उन्होंने बीजेपी छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल होने का फैसला किया था.

तब उन्होंने बड़ा हल्ला मचाया था कि वो बीजेपी को बरबाद कर देंगे. स्वामी प्रसाद ने ये भी दावा किया है कि 2017 में बीजेपी उत्तर प्रदेश में सत्ता में आई ही उनकी वजह से थी. 2022 में मौर्य ने समाजवादी पार्टी को सत्ता में लाने का दावा किया था. हालांकि उनके तमाम बड़बोले बयान मुंगेरी लाल के रंगीन सपने साबित हुए थे. सपा को सत्ता दिलाना तो दूर वो खुद अपना चुनाव भी फाजिलनगर सीट से हार गये थे.

दोस्तो 2022 में मौर्य ने बीजेपी इसलिए छोड़ी थी क्योंकि बीजेपी उन्हें पडरौना की विधानसभा सीट से टिकट नहीं देना चाहती थी क्योंकि बीजेपी को पता था कि वो चुनाव हार जाएंगे. एक वजह और थी कि मौर्य अपने बेटे के लिए रायबरेली की ऊंचाहार विधानसभा सीट से टिकट चाहते थे और बीजेपी ने इनकार कर दिया था.

हालांकि समाजवादी ने भी 2022 में उन्हें पडरौना विधानसभा सीट से टिकट नहीं दिया था. क्योंकि समाजवादी पार्टी भी जानती थी कि पडरौना विधानसभा क्षेत्र में मौर्य बुरी तरह बदनाम हैं. जिस सीट से अखिलेश ने उन्हें टिकट दिया यानी फाजिलनगर वहां से भी मौर्य अपना चुनाव हार गये.

बड़े मज़बूत जनाधार वाले नेता होने का दावा करने वाले मौर्य को विधानसभा का चुनाव हारने के बाद अखिलेश यादव के रहमोकरम पर विधान परिषद का सदस्य बनाया गया था.

अब 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले भी स्वामी प्रसाद मौर्य वही दांव आज़माना चाहते हैं जो उन्होंने 2022 में आज़माया था. यानी वो अपने लिये, अपने बेटे के लिये, और अपनी बेटी संघमित्रा मौर्य के लिए अखिलेश यादव से तगड़ी बारगेनिंग करना चाहते हैं. उनकी बेटी संघमित्रा मौर्य 2019 में बीजेपी के टिकट पर सांसद बनी थीं जब वो बीजेपी में थे.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक स्वामी प्रसाद मौर्य राज्यसभा के टिकट वितरण पर अखिलेश यादव से नाराज हैं. एसपी की ओर से राज्यसभा के लिए तीन में से दो उम्मीदवार सामान्य वर्ग से बनाये गये हैं.
टिकट वितरण में उनकी सहमति तो दूर, महासचिव होने के बावजूद कोई जानकारी तक नहीं दी गई.
सपा ने रामजीलाल सुमन, आलोक रंजन और जया बच्चन को राज्यसभा का टिकट दिया है.
रिपोर्ट है कि वो जया बच्चन को पांचवीं बार राज्यसभा प्रत्याशी बनाए जाने के खिलाफ हैं.

एक रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि स्वामी प्रसाद मौर्य नहीं चाहते थे कि फर्रुखाबाद से डॉ. नवल किशोर शाक्य को प्रत्याशी बनाया जाए. दरअसल डॉ. शाक्य की शादी मौर्य की बेटी संघमित्रा से हुई थी, लेकिन बाद में दोनों का तलाक हो गया था. किशोर शाक्य को टिकट मिलने से शायद मौर्य असहज हो रहे हैं.

एक और वजह कही जा रही है कि स्वामी प्रसाद धार्मिक आडंबरों पर लगातार हमला बोल रहे थे और भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा को भी अवैज्ञानिक धारणा बता रहे थे लेकिन उसी समय अखिलेश यादव भगवान शालिग्राम पूजा करते सार्वजनिक तौर पर दिखाई दे गये और उसी दिन मौर्य ने सपा के राष्ट्रीय महासचिव पद से इस्तीफे का एलान कर दिया.

साफ दिखाई दे रहा है कि उनका इस्तीफा अखिलेश पर दबाव बनाने की रणनीति है. वो ये देखना चाहते हैं कि सपा नेतृत्व उनके इस कदम से कितना दबाव में आता है और किसी अन्य दल की तरफ से कितना महत्व मिलता है.

उम्मीद है कि अखिलेश के दबाव में आने पर लोकसभा टिकट वितरण में उनके कहने से कुछ टिकट दिए जा सकते हैं। स्वामी प्रसाद की बेटी संघमित्रा बदायूं से भाजपा सासंद हैं, जहां से सपा ने धर्मेंद्र यादव को टिकट दे दिया है. अब स्वामी प्रसाद अपनी बेटी के लिए आंवला से टिकट चाहते हैं.

स्वामी प्रसाद मौर्य और उनके परिवार के लिए सिद्धांत और नैतिकता कितने महत्वपूर्ण हैं ये इसी बात से समझा जा सकता है कि उन्होंने खुद तो 2022 में बीजेपी से इस्तीफा दे दिया लेकिन सरकारी सुविधाओं के लालच में अपनी बेटी से इस्तीफा नहीं दिलवाया. उनकी बेटी अभी तक एक सांसद के तौर पर मिलने वाली सुविधाएं भोग रही हैं.

13 फरवरी को स्वामी प्रसाद मौर्य ने जब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव पद से इस्तीफा दिया तो एक बार फिर उनकी चालबाज़ी समझ में आ गई. उन्होंने ना तो सपा की सदस्यता छोड़ी और ना ही विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दिया.

मतलब उन्होंने केवल वो पद छोड़ा जिससे कोई सुविधा जुड़ी हुई नहीं है.

इसके अलावा ये भी समझना बड़ा ज़रूरी है कि लोकसभा चुनाव के लिहाज़ से मौर्य की राजनीतिक हैसियत आखिर कुछ है भी या नहीं. अगर 2019 के लोकसभा चुनाव की तुलना 2014 से करें जब स्वामी प्रसाद मौर्य बीएसपी में थे तो कई मजेदार आंकड़े निकल कर सामने आते हैं.

जैसे 2014 में बीजेपी को लोकसभा की 71 सीटें हासिल हुई थीं जबकि बीएसपी को ज़ीरो सीट मिली थी. लेकिन जब 2019 में स्वामी बीजेपी में थे तो बीजेपी की सीटें घटकर 62 रह गईं और बीएसपी की सीटें 2014 के मुकाबले 10 बढ़ गईं.

इन तमाम आंकड़ों को जानने के बाद अब आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि स्वामी प्रसाद मौर्य किसके वोट और सीटें घटवा सकते हैं और किसकी बढ़वा सकते हैं.

इसके साथ-साथ स्वामी प्रसाद मौर्य के बारे में ये भी जानना ज़रूरी है कि उन्होंने जब जब कोई पार्टी छोड़ी है तो ये आरोप लगाया है कि उस पार्टी में ग़रीबों और वंचितों के साथ भेदभाव होता है। जब उन्होंने बीएसपी छोड़ी तो आरोप लगाया कि मायावती टिकट बिना भेदभाव के नहीं बल्कि पैसे लेकर देती हैं.

जब 2022 में उन्होंने बीजेपी छोड़ी तो उन्होंने बीजेपी पर ग़रीबों और वंचितों के साथ भेदभाव का आरोप लगाया. और अब जब 2024 में उन्होंने सपा के राष्ट्रीय महासचिव पद से रिज़ाइन किया तो फिर अखिलेश यादव पर ग़रीबों और वंचितों के साथ भेदभाव का आरोप लगा दिया.

यानी उनकी नज़र में बीएसपी, बीजेपी, और एसपी तीनों ग़रीबों और वंचितों के साथ भेदभाव करती हैं. शायद अब उनका अगला ठिकाना इन तीन पार्टियों के अलावा कोई और पार्टी हो सकती है. अब उत्तर प्रदेश में इन तीन पार्टियों के अलावा किस पार्टी की क्या औकात है ये आप अच्छी तरह जानते हैं.

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